जिस रात पानी चमका
कमिला प्यूर्टो रिको में अपनी नानी के घर के पास वाली खाड़ी में कई बार गई थी, पर हमेशा दिन में। आज की रात अलग थी। उसके चचेरे भाई दिएगो ने उससे एक सरप्राइज़ का वादा किया था: वे अँधेरा होने के बाद कयाक में निकलने वाले थे।
आसमान में चाँद नहीं था। पानी काला और शांत दिख रहा था। कमिला ने अपना चप्पू कसकर पकड़ा। “हम आखिर ढूँढ क्या रहे हैं?” उसने फुसफुसाकर पूछा।
“अपना चप्पू पानी में डुबाओ,” दिएगो ने मुस्कुराते हुए कहा।
कमिला ने चप्पू खाड़ी में डाला। अचानक उसके चारों ओर का पानी नीली-हरी रोशनी से चमक उठा, जैसे किसी ने हज़ारों नन्हे तारे बिखेर दिए हों। कमिला की साँस अटक गई और उसने चप्पू बाहर निकाला। उससे चमकती बूँदें ऐसे गिर रही थीं, जैसे चिंगारियों की बारिश हो रही हो।
“क्या यह जादू है?” उसने पूछा।
“यह जादू से भी अच्छा है,” दिएगो ने कहा। “यह विज्ञान है। पानी में प्लवक नाम के बहुत छोटे-छोटे जीव भरे हैं, जो आँखों से दिखते भी नहीं। जब पानी हिलता है, तो वे रोशनी छोड़ते हैं। इसे जैवदीप्ति कहते हैं।”
कमिला ने अपनी उँगलियाँ पानी में फिराईं, तो पाँच चमकती लकीरें उनके पीछे-पीछे चलीं। एक मछली तेज़ी से कयाक के नीचे से निकली और पीछे चमकता रास्ता छोड़ गई।
“ये चमकते क्यों हैं?” उसने पूछा।
“वैज्ञानिकों का मानना है कि यह चमक उन जानवरों को डरा सकती है जो इन्हें खाना चाहते हैं,” दिएगो ने कहा। “जैसे अचानक बजने वाला अलार्म।”
किनारे की ओर लौटते हुए कमिला चुप रही। वह बार-बार यही सोच रही थी कि इतनी छोटी-सी चीज़ इतनी सुंदर रोशनी कैसे बना सकती है।
अगली सुबह नाश्ते के समय उसने चमकते चप्पू की तस्वीर बनाई। नीचे उसने लिखा, “छोटी चीज़ें भी चमक सकती हैं।”