टेढ़ी-मेढ़ी रोटी
हर रविवार रवि अपने दादाजी के साथ पूरे परिवार के लिए रोटियाँ बनाता है। दादाजी की रोटियाँ एकदम गोल होती हैं, बिल्कुल छोटे-छोटे पूरे चाँद जैसी।
सबसे पहले वे एक बड़े बर्तन में आटा, एक चुटकी नमक और गुनगुना पानी मिलाते हैं। रवि अपनी उँगलियों से आटा तब तक गूँधता है, जब तक वह नरम और चिकना न हो जाए। फिर दादाजी उसे बेलन से एक छोटी लोई बेलना सिखाते हैं। “बेलो, घुमाओ, बेलो, घुमाओ,” दादाजी गाते हैं।
रवि पूरी कोशिश करता है, पर उसकी पहली रोटी तिकोनी बन जाती है। दूसरी किसी टापू के नक्शे जैसी लगती है। और तीसरी के बीच में तो बड़ा-सा छेद है! रवि मुँह बनाता है। “मेरी सारी रोटियाँ टेढ़ी-मेढ़ी हैं,” वह कहता है।
दादाजी हँसते हैं और फिर भी रवि की रोटियाँ गरम तवे पर डाल देते हैं। रोटियाँ फूल जाती हैं और उन पर छोटे-छोटे भूरे निशान बन जाते हैं। “चखकर देखो,” दादाजी कहते हैं। रवि एक कौर खाता है। रोटी गरम, नरम और बहुत स्वादिष्ट है।
रात के खाने पर उसकी छोटी बहन आशा सबसे पहले तिकोनी रोटी उठाती है। “इसका आकार सबसे अच्छा है,” वह कहती है। “इससे दाल उठाना कितना आसान है!” सब हँस पड़ते हैं, और रवि को अपनी टेढ़ी-मेढ़ी रोटियों पर बहुत गर्व होता है।