बायू ने जंगल लगाया
बायू इंडोनेशिया के एक द्वीप पर मछुआरों के गाँव में रहता था। एक दिन उसके दादाजी उसे समुद्र तट पर ले गए। उनके पास छोटे-छोटे हरे पौधों से भरी एक बाल्टी थी।
“ये मैंग्रोव के नन्हे पेड़ हैं,” दादाजी ने कहा। “मैंग्रोव वहाँ उगते हैं, जहाँ समुद्र और ज़मीन मिलते हैं। इनकी जड़ें पानी में खड़ी लंबी टाँगों जैसी दिखती हैं।”
“हम इन्हें क्यों लगा रहे हैं?” बायू ने पूछा।
दादाजी ने किनारे की ओर इशारा किया। “जब बड़ी लहरें आती हैं, तो मैंग्रोव की जड़ें रेत को थामे रखती हैं। ये हमारे गाँव की रक्षा करती हैं। और जड़ों के बीच छोटी मछलियाँ, केकड़े और झींगे बड़े जानवरों से बचकर छिपते हैं।”
बायू ने हर नन्हे पौधे को नरम कीचड़ में दबाया। कीचड़ चिपचिपा था, और जल्दी ही उसके पैर भूरे हो गए। उसने एक लंबी कतार में बीस छोटे पेड़ लगाए।
हर महीने बायू उन्हें देखने जाता था। ज़्यादातर पौधों पर नई पत्तियाँ आ गईं। कुछ पौधे बच नहीं पाए, तो उसने उनकी जगह नए पौधे लगा दिए।
दो साल बाद मैंग्रोव बायू से भी ऊँचे हो गए। एक सुबह उसने उनकी जड़ों के बीच नन्ही मछलियाँ तैरती देखीं। “देखिए दादाजी,” उसने धीरे से कहा, “हमने इनके लिए एक घर लगाया है।”