छत वाला कैफ़े
भारत के जयपुर में गर्मियों का सबसे गरम हफ़्ता चल रहा था। धूप इतनी तेज़ थी कि गली के कुत्ते भी छाँव में सो रहे थे।
दीया और उसका भाई अर्जुन अपने घर की छत पर खेल रहे थे, तभी उन्होंने एक छोटी-सी गौरैया देखी। वह चोंच खोले दीवार पर फुदक रही थी।
“लगता है इसे प्यास लगी है,” दीया ने कहा। “पर इतनी गर्मी में चिड़ियाँ पानी कहाँ से पाएँ?”
अर्जुन ने चारों ओर देखा। कहीं कोई तालाब या पानी का गड्ढा नहीं था। “चलो, इनके लिए पानी का बर्तन बनाते हैं!” उसने कहा।
उन्हें मिट्टी का एक पुराना मटका मिला, जिसे माँ अब इस्तेमाल नहीं करती थीं। अर्जुन ने उसमें ठंडा पानी भरा। दीया ने बीच में एक चपटा पत्थर रख दिया, ताकि छोटी चिड़ियाँ उस पर बिना फिसले खड़ी हो सकें। उन्होंने मटका एक पौधे की छाँव में रख दिया।
पहले तो कुछ नहीं हुआ। फिर गौरैया वापस आई। उसने खूब पानी पिया। फिर वह पानी में पंख फड़फड़ाकर छपाक-छपाक करने लगी!
अगली सुबह मटके के चारों ओर पाँच गौरैया, दो कबूतर और एक हरा तोता बैठे थे। दीया और अर्जुन पूरी गर्मियों में रोज़ मटका भरते रहे। उन्होंने उसका नाम रखा, “छत वाला कैफ़े”।