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हर साल मोहल्ले में स्कूल के मैदान में एक फ़ूड फ़ेयर लगता था। परिवार घर के पकवान बनाकर बेचते थे, और उस पैसे से स्कूल की लाइब्रेरी के लिए नई किताबें ख़रीदी जाती थीं। इस साल पहली बार सेउन और उसके तीन चचेरे भाई-बहनों, बिसी, तायो और छोटी केमी, को अपना ख़ुद का स्टॉल चलाने की इजाज़त मिली।
फ़ोलाके दादी ने उन्हें दो हज़ार नायरा का बजट दिया। “सामान ख़रीदने के लिए तुम्हारे पास बस इतने ही पैसे हैं,” उन्होंने कहा। “इन्हें समझदारी से ख़र्च करना।” बच्चों ने पफ़-पफ़ बनाने का फ़ैसला किया। ये तले हुए आटे के नरम-नरम गोले होते हैं, जिन पर चीनी बुरकी जाती है, और ये सबको बहुत पसंद थे।
बाज़ार में सेउन आटे का सबसे बड़ा थैला, शहद का एक डिब्बा और रंग-बिरंगी स्प्रिंकल्स का एक चमकीला डिब्बा ख़रीदना चाहता था। बिसी ने भौंहें सिकोड़ीं और अपनी नोटबुक देखी। “अगर हमने यह सब ख़रीद लिया, तो तेल के पैसे नहीं बचेंगे,” उसने कहा। सेउन ने आह भरी और स्प्रिंकल्स वापस रख दिए। तायो ने आटे वाली आंटी से विनम्रता से मोल-भाव किया, और उन्होंने थोड़ी छूट दे दी।
गरम तेल का काम दादी ने सँभाला, और बच्चों ने आटा मिलाया, उसके फूलने का इंतज़ार किया और गोले बनाए। केमी के ज़िम्मे चीनी थी। उसने अपना काम बहुत गंभीरता से लिया और हर पफ़-पफ़ पर बर्फ़ की तरह चीनी बुरकी।
जब मेला शुरू हुआ, तो उनके स्टॉल पर लाइन लंबी, और लंबी होती गई। दोपहर तक सब कुछ बिक चुका था। पैसे गिने तो पता चला कि उन्होंने जितना ख़र्च किया था, उसका तीन गुना कमा लिया था।
उस शाम सब बच्चे दादी के घर की सीढ़ियों पर बैठे थे, थके हुए, और हाथ चीनी से चिपचिपे। “अगले साल,” सेउन ने कहा, “शायद हम स्प्रिंकल्स भी ख़रीद पाएँगे।” बिसी हँसी और उसने अपनी नोटबुक का एक नया पन्ना खोला। “मैं कल से ही योजना बनाना शुरू करूँगी।”
सही उत्तर के पास वाले गोले में रंग भरो।