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फ़्रेया की माँ, इंग्रिड, पहाड़ों पर बचाव दल में काम करती थीं, और उनका साथी था टुंड्रा नाम का एक बड़ा, रोएँदार कुत्ता। टुंड्रा का काम था बर्फ़ीली ढलानों पर खोए हुए या घायल लोगों को ढूँढना। अपनी तेज़ नाक से वह बर्फ़ के नीचे दबे इंसान को भी सूँघ लेता था।
सर्दियों के एक सप्ताहांत, फ़्रेया अपनी माँ के साथ पहाड़ों में ऊपर बनी बचाव झोपड़ी में रुकी। फ़्रेया को वह झोपड़ी बहुत पसंद थी, जिसमें गरम अँगीठी थी और हर दीवार पर नक्शे लगे थे। लेकिन मेज़ पर रखा बड़ा रेडियो उसे अच्छा नहीं लगता था। जब वह खड़खड़ाता, तो उसके पेट में गाँठ-सी पड़ जाती। अजनबियों से बात करना, चाहे रेडियो पर ही क्यों न हो, उसे बेचैन कर देता था।
उस दोपहर एक संदेश आया। एक स्कीयर जमी हुई झील के पास गिर गई थी और चल नहीं पा रही थी। इंग्रिड ने टुंड्रा को उसकी नारंगी जैकेट पहनाई। “फ़्रेया, तुम रेडियो के पास रहना,” उन्होंने कहा। “अगर हेलिकॉप्टर से कॉल आए, तो उन्हें बता देना कि हम कहाँ हैं।” फिर वे दोनों सफ़ेद पहाड़ियों में ओझल हो गए।
फ़्रेया इंतज़ार करती रही। घड़ी टिक-टिक करती रही। अचानक रेडियो खड़खड़ाया। “बचाव झोपड़ी, हम हेलिकॉप्टर से बोल रहे हैं। टीम कहाँ है?” फ़्रेया के हाथ काँपने लगे। उसका मन हुआ कि मेज़ के नीचे छिप जाए। फिर उसे याद आया कि टुंड्रा गहरी बर्फ़ में भी कभी रुकता नहीं, बस आगे बढ़ता रहता है।
फ़्रेया ने रेडियो उठाया और बटन दबाया। “यह बचाव झोपड़ी है,” उसने कहा। शुरू में उसकी आवाज़ काँप रही थी। “टीम जमी हुई झील पर है, उत्तर की तरफ़।” उसने नक्शा देखा और जोड़ा, “तीन ऊँची चट्टानों के पास।”
“धन्यवाद, बचाव झोपड़ी। बहुत बढ़िया,” पायलट ने कहा।
उस शाम वह स्कीयर सुरक्षित अस्पताल में थी; उसका टखना टूट गया था। टुंड्रा अँगीठी के पास खर्राटे ले रहा था। इंग्रिड ने फ़्रेया को कसकर गले लगाया। “आज तुमने किसी की जान बचाने में मदद की,” उन्होंने कहा। फ़्रेया मुस्कुराई। उसने सोचा, अगली बार जब रेडियो खड़खड़ाएगा, तो शायद सबसे पहले जवाब वही देगी।
सही उत्तर के पास वाले गोले में रंग भरो।