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एलिफ़ बहुत सुबह जाग गई, जब आसमान अभी गुलाबी ही था। “जल्दी करो,” दादी ने धीरे से कहा। “गुब्बारे आ रहे हैं!”
वे गरम दूध के दो कप लेकर अपने घर की सपाट छत पर चढ़ गईं। एक-एक करके, गरम हवा के गुब्बारे चट्टानी पहाड़ियों के ऊपर उठने लगे: एक लाल, एक पीला, एक धारीदार। एलिफ़ ने तेईस गिने!
अचानक एक नीला गुब्बारा नीचे, और नीचे उतरने लगा। वह उनके बगीचे के बगल वाले खेत में धीरे से उतर गया। टोकरी उछली और डगमगाई, और अंदर बैठे लोग ख़ुशी से चिल्लाए।
पायलट बाहर निकला और हाथ हिलाया। “सुप्रभात!” उसने पुकारा। “क्या तुम गुब्बारा मोड़ने में मेरी मदद करोगी?” एलिफ़ इतनी तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरी कि जूते पहनना ही भूलने वाली थी।
गुब्बारा एक घर जितना बड़ा और चादर जितना मुलायम था। एलिफ़ और दादी खींचती और मोड़ती रहीं, जब तक वह एक साफ़-सुथरा गट्ठर नहीं बन गया। “धन्यवाद, मददगारो,” पायलट ने कहा। उस रात एलिफ़ ने सपना देखा कि वह पहाड़ियों के ऊपर ऊँचे आसमान में तैर रही है।
सही उत्तर के पास वाले गोले में रंग भरो।