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दादाजी के पास एक लाल ऊनी टोपी थी, जिस पर सफ़ेद फुंदना लगा था। सूँ-सूँ! हवा चली। और टोपी उड़ गई!
वह स्लेज के ऊपर से उड़ी। “रुक जा, टोपी!” ओला ने पुकारा। पर टोपी नहीं रुकी।
वह बर्फ़ के पुतले के पास से उड़ी। “रुक जा, टोपी!” ओला ने पुकारा। पर टोपी नहीं रुकी।
टप! वह एक छोटे भूरे कुत्ते पर जा गिरी। कुत्ते ने पूँछ हिलाई। वह बहुत गरम और बहुत ख़ुश लग रहा था।
ओला और दादाजी हँसते रहे, हँसते रहे। “यह टोपी तुम पर बहुत जँचती है,” दादाजी ने कुत्ते से कहा।
सही उत्तर के पास वाले गोले में रंग भरो।