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एलिफ़ और उसके दादाजी अँधेरे में ही उठ गए। वे तुर्की के कप्पादोकिया में अपने गुफा वाले होटल से दबे पाँव बाहर निकले और एक छोटी-सी पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गए। “देदे, हम इतनी जल्दी क्यों उठे?” एलिफ़ ने जम्हाई लेते हुए पूछा।
“रुको और देखो,” देदे ने उसे अपनी गरम जैकेट में लपेटते हुए कहा।
धीरे-धीरे आसमान का रंग स्लेटी से गुलाबी हो गया। फिर एलिफ़ ने ज़ोर की आवाज़ सुनी: व्हूऽऽश! चट्टानों के पीछे एक विशाल गुब्बारे में गरम हवा भर रही थी। एक और व्हूश, फिर एक और! एक-एक करके बड़े-बड़े गुब्बारे आसमान में उठने लगे: लाल, पीले, और एक इंद्रधनुषी धारियों वाला।
“ये उड़ते कैसे हैं?” एलिफ़ ने पूछा। “एक बर्नर अंदर की हवा को गरम करता है,” देदे ने कहा। “गरम हवा ठंडी हवा से हल्की होती है, इसलिए वह ऊपर उठती है और गुब्बारे को उठा लेती है, जैसे पानी में बुलबुला ऊपर आता है।”
एलिफ़ ने ऊँची चट्टानी मीनारों के ऊपर तैरते चालीस गुब्बारे गिने। एक गुब्बारा इतना नीचे से गुज़रा कि उसकी टोकरी में बैठे लोगों ने उसकी ओर हाथ हिलाया। एलिफ़ ने दोनों हाथ हिलाकर जवाब दिया।
जब सूरज उगा, तो गुब्बारे लालटेनों की तरह चमकने लगे। “देदे,” एलिफ़ ने कहा, “यह तो देर तक सोने से भी अच्छा है!”
सही उत्तर के पास वाले गोले में रंग भरो।