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ज़ैन डॉक्टर के पास नहीं जाना चाहता था। “अगर दर्द हुआ तो?” उसने बर्मिंघम में बस में पापा से पूछा। उसने अपने पुराने टेडी, कैप्टन फुलकू, को कसकर पकड़ा हुआ था।
क्लिनिक में डॉक्टर अमीना मुस्कुराईं और कैप्टन फुलकू का पंजा मिलाया। “नमस्ते, कैप्टन,” उन्होंने कहा। “क्या आप पहले आना चाहेंगे?” ज़ैन ने सिर हिलाकर हाँ कहा।
डॉक्टर अमीना ने अपना स्टेथोस्कोप कैप्टन फुलकू के पेट पर रखा। “मैं इसका दिल सुन रही हूँ,” उन्होंने समझाया। “धक-धक। बहुत मज़बूत!” उन्होंने एक छोटी-सी टॉर्च से उसके कान देखे और दीवार पर लगे चार्ट से उसकी लंबाई नापी। “कैप्टन फुलकू बिल्कुल तंदुरुस्त भालू है।”
“अब तुम्हारी बारी,” डॉक्टर अमीना ने कहा। “क्या तुम भी सुनना चाहोगे?” उन्होंने ज़ैन को स्टेथोस्कोप अपने कानों में लगाकर अपना दिल सुनने दिया। धक-धक! आवाज़ तेज़ और जल्दी-जल्दी थी, जैसे कोई छोटा ढोल बज रहा हो।
ज़ैन ने धीरे से साँस छोड़ी। जाँच में ज़रा भी दर्द नहीं हुआ। आखिर में डॉक्टर अमीना ने उसे एक चमकीला स्टिकर दिया, और एक कैप्टन फुलकू के लिए भी।
घर लौटते हुए बस में ज़ैन ने कहा, “पापा, बड़ा होकर शायद मैं डॉक्टर बनूँ।” सीने पर स्टिकर लगाए कैप्टन फुलकू भी जैसे हामी भर रहा था।
सही उत्तर के पास वाले गोले में रंग भरो।