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वलेरिया के मामा आंद्रेस कोस्टा रिका के एक समुद्र तट पर रेंजर थे। एक शाम उन्होंने उसे फ़ोन किया। “जल्दी आओ और अपनी लाल टॉर्च ले आना। कछुओं के अंडे फूट रहे हैं!”
तट पर कुछ लोग एक रस्सी के पीछे चुपचाप इंतज़ार कर रहे थे। एक छोटे-से घेरे के अंदर रेत हिल रही थी। एक नन्हा-सा सिर बाहर निकला, फिर दूसरा, फिर एक और! दर्जनों नन्हे समुद्री कछुए, इतने छोटे कि वलेरिया की हथेली में समा जाएँ, घोंसले से बाहर निकल आए।
“हम सिर्फ़ लाल रोशनी क्यों इस्तेमाल करते हैं?” वलेरिया ने फुसफुसाकर पूछा।
“नन्हे कछुए सबसे तेज़ रोशनी की ओर रेंगकर समुद्र ढूँढते हैं,” आंद्रेस मामा ने कहा। “आमतौर पर वह पानी पर चमकता चाँद होता है। तेज़ सफ़ेद बत्तियाँ उन्हें भटका सकती हैं, और वे गलत दिशा में जा सकते हैं।”
नन्हे कछुए अपने छोटे-छोटे पंख जैसे पैर फड़फड़ाते हुए रेत पर तेज़ी से नीचे की ओर चले। एक लहर आई और पहले वालों को अपने साथ ले गई। वलेरिया ने सत्ताईस कछुओं को समुद्र तक पहुँचते गिना।
“क्या वे वापस आएँगे?” उसने पूछा। “कुछ ज़रूर आएँगे,” मामा ने कहा। “जब वे बड़े होंगे, तो माँएँ अपने अंडे देने इसी तट पर लौटेंगी।” वलेरिया चमकते पानी को देखकर मुस्कुराई। “तब मिलेंगे, नन्हे दोस्तो।”
सही उत्तर के पास वाले गोले में रंग भरो।