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वान्जीरू की दादी माउंट केन्या के पास अपने खेत में मधुमक्खियाँ पालती थीं। छत्ते लकड़ी के डिब्बे थे, जो ऊँचे पेड़ों की डालियों से लटके रहते थे।
“मधुमक्खियाँ हर सुबह उड़कर कहाँ जाती हैं?” वान्जीरू ने पूछा।
“वे फूलों से मिलने जाती हैं,” दादी ने कहा। “हर फूल के अंदर एक मीठा रस होता है, जिसे मकरंद कहते हैं। मधुमक्खियाँ उसे पीती हैं और घर ले आती हैं। छत्ते में वे मकरंद को शहद में बदल देती हैं।”
वान्जीरू ने एक मधुमक्खी को बैंगनी फूल पर बैठते देखा। उसके पैरों पर पीली धूल लगी थी। “इसे पराग कहते हैं,” दादी ने समझाया। “जब मधुमक्खियाँ पराग को एक फूल से दूसरे फूल तक ले जाती हैं, तो वे पौधों को बीज और फल बनाने में मदद करती हैं।”
वान्जीरू ने खेत की फलियों, एवोकाडो और कद्दुओं के बारे में सोचा। “तो मधुमक्खियाँ हमारा खाना उगाने में भी मदद करती हैं!”
“बिल्कुल सही,” दादी ने मुस्कुराकर कहा।
अगले दिन वान्जीरू ने घर के पास सूरजमुखी के बीजों की एक कतार बोई। वह रोज़ उन्हें पानी देती थी। कुछ हफ़्तों बाद सूरजमुखी ने अपने बड़े-बड़े पीले चेहरे खोले, और मधुमक्खियाँ भिनभिनाती हुई उनसे मिलने आईं। वान्जीरू ने हाथ हिलाकर कहा, “स्वागत है, मेरी मेहनती दोस्तो!”