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सलमा हमेशा सोचती थी कि रेगिस्तान धरती की सबसे सूखी जगह है। इसलिए जब उसकी मौसी नादिया ने कहा, “आज हम समुद्री जीव ढूँढने चलेंगे,” तो वह बहुत हैरान हुई।
नादिया मौसी भूवैज्ञानिक थीं, यानी ऐसी वैज्ञानिक जो चट्टानों का अध्ययन करती हैं। वे सलमा को कार से मोरक्को में अरफ़ूद के पास पथरीली पहाड़ियों तक ले गईं। धूप तेज़ थी, और ज़मीन स्लेटी और भूरे पत्थरों से ढकी थी।
“लाखों-करोड़ों साल पहले,” नादिया मौसी ने बताया, “यह सारी ज़मीन एक गरम, उथले समुद्र के नीचे थी। जब समुद्री जीव मरते थे, तो वे कीचड़ में धँस जाते थे। बहुत लंबे समय में धीरे-धीरे कीचड़ चट्टान बन गया, और जीवों का आकार पत्थर में बदल गया। इसे हम जीवाश्म कहते हैं।”
सलमा घुटनों के बल बैठकर ढूँढने लगी। बहुत देर तक उसे सिर्फ़ मामूली कंकड़ ही मिले। उसके घुटनों में दर्द होने लगा, और उसे गर्मी और थकान महसूस होने लगी। तभी उसकी नज़र एक ऐसे पत्थर पर पड़ी, जिस पर सीपी की धारियों जैसी बारीक रेखाएँ थीं। उसने उस पर से धूल हटाई।
वह एक बड़े कीड़े जैसा दिखता था, जिसका सिर मुड़ा हुआ था और शरीर कई हिस्सों से बना था।
“ट्राइलोबाइट!” नादिया मौसी ने चमकती आँखों से कहा। “ये जीव डायनासोरों से भी बहुत पहले समुद्र की तली पर रेंगते थे।”
सलमा ने जीवाश्म को अपनी हथेली पर रखा। यह सोचना मुश्किल था कि जहाँ आज ऊँट चलते हैं, वहाँ कभी समुद्री जीव तैरते थे। उसने पहाड़ियों की ओर देखा और लहरों की कल्पना करने की कोशिश की।
उस शाम उसने अपनी डायरी में लिखा, “आज मैंने अपने हाथ में डायनासोरों से भी पुरानी चीज़ पकड़ी। रेगिस्तान को समुद्र याद है।”
उसने ट्राइलोबाइट को अपने कमरे की शेल्फ़ पर, ठीक अपने आवर्धक लेंस के बगल में रख दिया। वह तय कर चुकी थी कि बड़ी होकर क्या बनेगी।