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कमिला प्यूर्टो रिको में अपनी नानी के घर के पास वाली खाड़ी में कई बार गई थी, पर हमेशा दिन में। आज की रात अलग थी। उसके चचेरे भाई दिएगो ने उससे एक सरप्राइज़ का वादा किया था: वे अँधेरा होने के बाद कयाक में निकलने वाले थे।
आसमान में चाँद नहीं था। पानी काला और शांत दिख रहा था। कमिला ने अपना चप्पू कसकर पकड़ा। “हम आखिर ढूँढ क्या रहे हैं?” उसने फुसफुसाकर पूछा।
“अपना चप्पू पानी में डुबाओ,” दिएगो ने मुस्कुराते हुए कहा।
कमिला ने चप्पू खाड़ी में डाला। अचानक उसके चारों ओर का पानी नीली-हरी रोशनी से चमक उठा, जैसे किसी ने हज़ारों नन्हे तारे बिखेर दिए हों। कमिला की साँस अटक गई और उसने चप्पू बाहर निकाला। उससे चमकती बूँदें ऐसे गिर रही थीं, जैसे चिंगारियों की बारिश हो रही हो।
“क्या यह जादू है?” उसने पूछा।
“यह जादू से भी अच्छा है,” दिएगो ने कहा। “यह विज्ञान है। पानी में प्लवक नाम के बहुत छोटे-छोटे जीव भरे हैं, जो आँखों से दिखते भी नहीं। जब पानी हिलता है, तो वे रोशनी छोड़ते हैं। इसे जैवदीप्ति कहते हैं।”
कमिला ने अपनी उँगलियाँ पानी में फिराईं, तो पाँच चमकती लकीरें उनके पीछे-पीछे चलीं। एक मछली तेज़ी से कयाक के नीचे से निकली और पीछे चमकता रास्ता छोड़ गई।
“ये चमकते क्यों हैं?” उसने पूछा।
“वैज्ञानिकों का मानना है कि यह चमक उन जानवरों को डरा सकती है जो इन्हें खाना चाहते हैं,” दिएगो ने कहा। “जैसे अचानक बजने वाला अलार्म।”
किनारे की ओर लौटते हुए कमिला चुप रही। वह बार-बार यही सोच रही थी कि इतनी छोटी-सी चीज़ इतनी सुंदर रोशनी कैसे बना सकती है।
अगली सुबह नाश्ते के समय उसने चमकते चप्पू की तस्वीर बनाई। नीचे उसने लिखा, “छोटी चीज़ें भी चमक सकती हैं।”
हर साल मोहल्ले में स्कूल के मैदान में एक फ़ूड फ़ेयर लगता था। परिवार घर के पकवान बनाकर बेचते थे, और उस पैसे से स्कूल की लाइब्रेरी के लिए नई किताबें ख़रीदी जाती थीं। इस साल पहली बार सेउन और उसके तीन चचेरे भाई-बहनों, बिसी, तायो और छोटी केमी, को अपना ख़ुद का स्टॉल चलाने की इजाज़त मिली।
फ़ोलाके दादी ने उन्हें दो हज़ार नायरा का बजट दिया। “सामान ख़रीदने के लिए तुम्हारे पास बस इतने ही पैसे हैं,” उन्होंने कहा। “इन्हें समझदारी से ख़र्च करना।” बच्चों ने पफ़-पफ़ बनाने का फ़ैसला किया। ये तले हुए आटे के नरम-नरम गोले होते हैं, जिन पर चीनी बुरकी जाती है, और ये सबको बहुत पसंद थे।
बाज़ार में सेउन आटे का सबसे बड़ा थैला, शहद का एक डिब्बा और रंग-बिरंगी स्प्रिंकल्स का एक चमकीला डिब्बा ख़रीदना चाहता था। बिसी ने भौंहें सिकोड़ीं और अपनी नोटबुक देखी। “अगर हमने यह सब ख़रीद लिया, तो तेल के पैसे नहीं बचेंगे,” उसने कहा। सेउन ने आह भरी और स्प्रिंकल्स वापस रख दिए। तायो ने आटे वाली आंटी से विनम्रता से मोल-भाव किया, और उन्होंने थोड़ी छूट दे दी।
गरम तेल का काम दादी ने सँभाला, और बच्चों ने आटा मिलाया, उसके फूलने का इंतज़ार किया और गोले बनाए। केमी के ज़िम्मे चीनी थी। उसने अपना काम बहुत गंभीरता से लिया और हर पफ़-पफ़ पर बर्फ़ की तरह चीनी बुरकी।
जब मेला शुरू हुआ, तो उनके स्टॉल पर लाइन लंबी, और लंबी होती गई। दोपहर तक सब कुछ बिक चुका था। पैसे गिने तो पता चला कि उन्होंने जितना ख़र्च किया था, उसका तीन गुना कमा लिया था।
उस शाम सब बच्चे दादी के घर की सीढ़ियों पर बैठे थे, थके हुए, और हाथ चीनी से चिपचिपे। “अगले साल,” सेउन ने कहा, “शायद हम स्प्रिंकल्स भी ख़रीद पाएँगे।” बिसी हँसी और उसने अपनी नोटबुक का एक नया पन्ना खोला। “मैं कल से ही योजना बनाना शुरू करूँगी।”