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भारत के जयपुर में गर्मियों का सबसे गरम हफ़्ता चल रहा था। धूप इतनी तेज़ थी कि गली के कुत्ते भी छाँव में सो रहे थे।
दीया और उसका भाई अर्जुन अपने घर की छत पर खेल रहे थे, तभी उन्होंने एक छोटी-सी गौरैया देखी। वह चोंच खोले दीवार पर फुदक रही थी।
“लगता है इसे प्यास लगी है,” दीया ने कहा। “पर इतनी गर्मी में चिड़ियाँ पानी कहाँ से पाएँ?”
अर्जुन ने चारों ओर देखा। कहीं कोई तालाब या पानी का गड्ढा नहीं था। “चलो, इनके लिए पानी का बर्तन बनाते हैं!” उसने कहा।
उन्हें मिट्टी का एक पुराना मटका मिला, जिसे माँ अब इस्तेमाल नहीं करती थीं। अर्जुन ने उसमें ठंडा पानी भरा। दीया ने बीच में एक चपटा पत्थर रख दिया, ताकि छोटी चिड़ियाँ उस पर बिना फिसले खड़ी हो सकें। उन्होंने मटका एक पौधे की छाँव में रख दिया।
पहले तो कुछ नहीं हुआ। फिर गौरैया वापस आई। उसने खूब पानी पिया। फिर वह पानी में पंख फड़फड़ाकर छपाक-छपाक करने लगी!
अगली सुबह मटके के चारों ओर पाँच गौरैया, दो कबूतर और एक हरा तोता बैठे थे। दीया और अर्जुन पूरी गर्मियों में रोज़ मटका भरते रहे। उन्होंने उसका नाम रखा, “छत वाला कैफ़े”।
ज़ैनब तीसरी कक्षा की सबसे तेज़ धावक थी। खेल दिवस पर उसे तोमास, एली और क्वामे के साथ रिले दौड़ में दौड़ना था। हर बच्चा ट्रैक का एक चक्कर लगाकर लाल बैटन अगले धावक को थमाने वाला था।
पहली प्रैक्टिस में सब गड़बड़ हो गया। ज़ैनब इतनी तेज़ दौड़ी कि तोमास तैयार ही नहीं था। बैटन घास पर गिर गया। फिर एली और क्वामे आपस में टकरा गए। “हम तो बिल्कुल गड़बड़ हैं!” क्वामे ने कराहते हुए कहा।
कोच रोज़ा ने सबको पास बुलाया। “रिले दौड़ किसी एक तेज़ धावक की नहीं होती,” उन्होंने कहा। “यह चार धावकों और तीन अच्छे पास की दौड़ है।” उन्होंने सिखाया कि हाथ पीछे की ओर कैसे फैलाना है और बैटन आते ही “अभी!” कैसे चिल्लाना है।
पूरे हफ़्ते उन्होंने बार-बार बैटन थमाने की प्रैक्टिस की। तोमास बहुत तेज़ नहीं था, पर उसने कभी बैटन नहीं गिराया। एली ने बिल्कुल सही पल पर दौड़ना शुरू करना सीख लिया।
खेल दिवस पर सीटी बजी। ज़ैनब ने अपनी पूरी ताक़त से दौड़ लगाई, और हर पास एकदम सही रहा। टीम दूसरे स्थान पर फ़िनिश लाइन पार कर गई। वे पहले नहीं आए, फिर भी वे ऐसे उछले और ख़ुशी से चिल्लाए, जैसे उन्होंने स्वर्ण पदक जीत लिया हो।