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हर पतझड़ में मेई के शहर में लालटेन रात मनाई जाती है। जब आसमान में अँधेरा हो जाता है, तो सब लोग जगमगाती काग़ज़ की लालटेनें लेकर नदी किनारे चलते हैं। कहीं मछली वाली लालटेनें होती हैं, कहीं तारे वाली, और एक विशाल ड्रैगन लालटेन भी, जिसे दस लोग मिलकर उठाते हैं।
इस साल मेई ने स्कूल में अपनी लालटेन ख़ुद बनाई थी। वह एक सफ़ेद खरगोश था, जिसके लंबे कान और गुलाबी काग़ज़ की आँखें थीं। मेई ने पूरे एक हफ़्ते उस पर मेहनत की थी।
लेकिन जुलूस शुरू होने से ठीक पहले बारिश की कुछ बूँदें गिरीं। एक बूँद खरगोश के कान पर गिरी, और पतला काग़ज़ फट गया। मेई की आँखों में आँसू भर आए। “मेरा खरगोश तो ख़राब हो गया,” उसने कहा।
पास ही उसके पड़ोसी, बुज़ुर्ग ली अंकल खड़े थे। “ज़रा दिखाओ तो,” उन्होंने कहा। उन्होंने जेब से पारदर्शी टेप का रोल निकाला और प्यार से कान जोड़ दिया। मेई के दोस्त बाओ ने उसे एक छोटा छाता दे दिया, ताकि लालटेन भीग न जाए।
थोड़ी देर में बारिश रुक गई। मेई अपने धीरे-धीरे चमकते खरगोश को लेकर नदी किनारे चल पड़ी। जुड़ा हुआ कान थोड़ा टेढ़ा था, इसलिए लगता था जैसे खरगोश कुछ सुन रहा हो। “मुझे लगता है, इसे संगीत पसंद आ रहा है,” ली अंकल ने मुस्कुराते हुए कहा।